सफलता की कहानी

विदेशी मुद्रा जापानी येन

विदेशी मुद्रा जापानी येन

जापानी मुद्रा क्या है?

जापानी येनजापान / मुद्रायेन जापान की मुद्रा है। यह अमेरिकी डॉलर और यूरो के बाद विदेशी मुद्रा बाजार में तीसरी सबसे बड़ी कारोबारी मुद्रा है। यह आरक्षित मुद्रा के रूप में भी अमेरिकी डॉलर, यूरो और पाउंड स्टर्लिंग के बाद व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती है। विकिपीडिया

जापान में 100 गुण कौन थे?

इसे सुनेंरोकेंशोगुन (जापानी: 将軍, अर्थ: सेनापति, महामंत्री) यह एक राजकीय उपाधि थी जो सन् ११९२ से १८६७ तक जापान के सम्राट के महामंत्री या सेनापति को दी जाती थी। यह सैन्य तानाशाह होते थे और अपने वंश चलाते थे।

जापान का ₹ 1 भारत के कितने रुपए के बराबर है?

इसे सुनेंरोकें1 भारतीय रुपया से जापानी येन वर्तमान विनिमय दर 1.6555 के बराबर है।

फ्रांस की मुद्रा को क्या कहते हैं?

इसे सुनेंरोकेंयूरो को मुद्रा के रूप में साझा करने वाले क्षेत्र में ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, साइप्रस, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आयरलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पुर्तगाल, स्लोवेनिया, स्पेन, साइप्रस शामिल हैं.

जापान इतना आगे क्यों है?

इसे सुनेंरोकेंजापान एक विकसित राष्ट्र है। दुनिया में जापान ने टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बहुत तरक्की की है, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के लगातार उन्नयन के दम पर ही जापान की अर्थव्यवस्था दुनिया में तीसरे क्रम पर है। जापान एक बौद्ध राष्ट्र है। जापान के मुकाबले भारत के पिछड़ने के अनेक कारण हैं।

जापान के लोग कितने घंटे सोते हैं?

इसे सुनेंरोकेंस्वस्थ शरीर के लिए इंसान को 24 घंटे में कम से कम 7-8 घंटे सोना बहुत जरूरी है, लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जापान में रहने वाले एक शख्स पिछले 12 साल से पूरे दिन में केवल 30 मिनट ही सोता है।

क्या जापान की अपनी सेना नहीं है?

इसे सुनेंरोकेंहालांकि दुनिया में ऐसे देशों की संख्या करीब 22 है लेकिन अधिकतर ने अपनी सुरक्षा का जिम्मा ऐसे देशों को दे रखा है जोकि पहले इन देशों पर शासन करते थे। दूसरी ओर विश्व युद्ध की भयानकता से प्रभावित होकर जापान जैसे देश ने भी सेना रखना बंद कर दिया।

जापान के पास सेना क्यों नहीं है?

इसे सुनेंरोकेंजापान के पास सेना क्यों नहीं है? इसे सैन्यवाद को रोकने के लिए क़ानून बनाया गया था। लेकिन १९४७ में सार्वजनिक सुरक्षा बल का गठन हुआ; और १९५४ में यह थल आत्मरक्षा बल का आधार बना। भले ही यह बल शाही जापानी सेना के छोटा है और केवल आत्मरक्षा के लिए है, यह आधुनिक जापान की सेना है।

जापानी लोग कैसे होते हैं?

इसे सुनेंरोकेंजापान के लोग दुनिया भर में सबसे ज्यादा हेल्दी और फिट माने जाते हैं। इसके पीछे उनकी खान-पान की आदतों का बहुत बड़ा हाथ है। एक रिसर्च के मुताबिक अमेरिका के लगभग 35% ओबेसिटी रेट के मुकाबले जापान में ओबेसिटी रेट महज लगभग 3% है। जापान की एक चौथाई से भी कम आबादी मोटापे के निर्धारित मापदंड को पार करती है।

एक ही देश की मुद्रा से तुलना स्थिति का सही चित्रण नहीं

प्रतीकात्मक चित्र

डॉलर के मुकाबले रुपए की वर्तमान गिरावट में घरेलू की बजाय वैश्विक परिस्थितियां ज्यादा कारक रही हैं, जैसे - रूस-यूक्रेन युद्ध, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय परिस्थितियां, यूएस फेडरल बैंक की ब्याज दरों में वृद्धि। यही कारण है कि इस दौर में ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन व यूरो में गिरावट रुपए से भी ज्यादा रही है। यह रुपए की मजबूती भी दर्शाता है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि अन्य मुद्राओं की तुलना में रुपया वैश्विक दबावों का सामना करने में ज्यादा सक्षम है। रुपया इन महीनों मे जहां डॉलर के मुकाबले 4.32 प्रतिशत गिरा है, वहीं येन, पाउंड व यूरो के मुकाबले 6.21 प्रतिशत बढ़ा है। यहां तक कि चाइनीज युआन के मुकाबले भी 0.68 प्रतिशत बढ़ा है। अत: रुपया भले ही डॉलर के मुकाबले गिरा है पर विश्व की अन्य मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है।

यदि हम इस दौर में आंकड़ों पर गौर करें तो यूरो फरवरी 2022 के 84.62 से जुलाई 2022 में 79.74 तक हो गया, जबकि पाउंड फरवरी 2022 के 102.59 से जुलाई 2022 में 95.74 तक आ गया। सिर्फ एक ही देश की मुद्रा से रुपए की तुलना स्थिति का सही चित्रण नहीं करती है। यदि हम विश्व की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं से तुलना करें तो स्पष्ट होता है कि रुपया अनकी तुलना में मजबूत हुआ है। किसी भी देश की मुद्रा की कीमत उस देश की मुद्रा के दूसरे देश की मुद्रा के साथ मांग व आपूर्ति पर निर्भर करती है।

अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार, जब एक देश आयात ज्यादा करेगा व निर्यात कम करेगा तो उसे विदेशी मुद्रा की ज्यादा जरूरत पड़ेगी व अपनी मुद्रा की मांग व कीमत गिरेगी। इस दौर में डॉलर का आउटफ्लो बढऩा रुपए की गिरावट के तात्कालिक कारणों में सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है। भारत कच्चे तेल की 80 प्रतिशत मात्रा आयात करता है। सिर्फ जुलाई माह के आयात-निर्यात के आंकड़े देखें तो कुल आयात जहां 66.22 मिलियन डॉलर रहा वहीं निर्यात सिर्फ 36.27 डॉलर। एक माह का व्यापार घाटा ही 30 बिलियन डॉलर है। इस तरह जब तक आयात पर निर्भरता ज्यादा रहेगी, मुद्रा की कीमत गिरने का खतरा बरकरार रहेगा।

गिरते रुपए का नुकसान यह होगा कि हमारे आयात महंगे होंगे जिससे कच्चा माल महंगा होगा, सामान की कीमतें बढ़ेंगी और अंतिम रूप से उपभोक्ता पर बोझ बढ़ेगा। मुद्रास्फीति की दर भी बढ़ेगी। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार भी कम हो जाएगा। नतीजा, सरकार व भारतीय रिजर्व बैंक को अन्य सख्त कदम उठाने पड़ेंगे। लेकिन इस स्थिति का सकारात्मक पहलू भी है और वह है निर्यात बढ़ाने का अवसर। हम निर्यात बढ़ाकर विदेशी बाजार में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ा सकते हैं तथा नए बाजार भी तलाश सकते हैं। महंगे आयातों से निपटने के लिए घरेलू विकल्पों को चुनना भी एक विकल्प है। रुपया सस्ता हुआ है तो निर्यात के साथ-साथ पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ेंगी जिससे दीर्घकाल में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने में मदद मिलेगी।

जरूरत आपदा को अवसर में बदलने की है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के साथ देश में नए स्टार्ट-अप और रिसर्च एंड डवलपमेंट को बढ़ावा देकर हम विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ा सकते हैं। सरकारी प्रयासों के साथ यदि 140 करोड़ देशवासियों के प्रयास जुड़ जाएं तो अगले 25 सालों में भारत मुख्य आयातक की जगह मुख्य निर्यातक देश होगा और रुपया दूसरी मुद्राओं की तुलना में सबसे मजबूत स्थिति में।

विदेशी मुद्रा जापानी येन

दिल्ली. भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार देश का विदेशी मुद्रा विदेशी मुद्रा जापानी येन भंडार चार नवंबर को खत्म हुए हफ्ते में 1.09 अरब डॉलर घटकर 529.99 अरब डॉलर रह गया. इसकी प्रमुख वजह देश के स्वर्ण भंडार में आई भारी गिरावट है. गौरतलब है कि पिछले सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार 6.56 अरब डॉलर बढ़कर 531.08 अरब डॉलर हो गया था, जो वर्ष के दौरान किसी एक सप्ताह में आई सबसे अधिक तेजी थी.

एक साल पहले अक्टूबर, 2021 में देश का विदेश मुद्रा भंडार 645 अरब डॉलर के अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था. देश के मुद्रा भंडार में गिरावट आने का मुख्य कारण यह है कि वैश्विक घटनाक्रमों की वजह से रुपये की गिरावट को थामने के लिए केन्द्रीय बैंक मुद्रा भंडार से मदद ले रहा है.

रिजर्व बैंक द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार चार नवंबर को समाप्त सप्ताह के दौरान मुद्रा भंडार का महत्वपूर्ण घटक मानी जाने वाली, विदेशी मुद्रा आस्तियां 12 करोड़ डॉलर घटकर 470.73 अरब डॉलर रह गयीं. डॉलर में दर्शाए जाने वाली विदेशी मुद्रा आस्तियों यानि फॉरेन करंसी एसेट्स में रखे यूरो, पौंड और जापानी येन जैसे गैर डॉलर मुद्रा के मूल्य में आई कमी या बढ़त के प्रभावों को दर्शाया जाता है.

आंकड़ों के अनुसार मूल्य के संदर्भ में देश का स्वर्ण भंडार 70.5 करोड़ डॉलर घटकर 37.057 अरब डॉलर रह गया. केंद्रीय बैंक ने कहा कि विशेष आहरण अधिकार 23.5 करोड़ डॉलर घटकर 17.39 अरब डॉलर रह गया है. आंकड़ों के अनुसार समीक्षाधीन सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में रखा देश का मुद्रा भंडार भी 2.7 करोड़ डॉलर घटकर 4.82 अरब डॉलर रह गया.

विदेशी मुद्रा जापानी येन

विदेशी मुद्रा भंडार 6.56 अरब डॉलर बढ़कर 531.08 अरब डॉलर पर पहुंचा

विदेशी मुद्रा भंडार 6.56 अरब डॉलर बढ़कर 531.08 अरब डॉलर पर पहुंचा

नई दिल्ली, 04 नवंबर (हि.स)। अर्थव्यवस्था के र्मोचे पर सरकार को राहत देने वाली खबर है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार 28 अक्टूबर को समाप्त हफ्ते में 6.56 अरब डॉलर बढ़कर 531.08 अरब डॉलर पर पहुंच गया। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने शुक्रवार को जारी आंकड़ों में यह जानकारी दी।

आरबीआई के मुताबिक पिछले दो हफ्ते से जारी देश के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट पर विराम लगा है। आंकड़ों के मुातबिक 28 अक्टूबर को समाप्त हफ्ते में 6.56 अरब डॉलर बढ़कर 531.08 अरब डॉलर पर पहुंच गया। उसके पिछले सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार 3.84 अरब डॉलर घटकर 524.52 अरब डॉलर रह गया था।

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक पिछले हफ्ते विदेशी मुद्रा भंडार के सबसे बड़े घटक विदेशी मुद्रा आस्तियां (एफसीए) भी 5.77 अरब डॉलर बढ़कर 470.84 अरब डॉलर पर पहुंच गई। इस दौरान देश का स्वर्ण भंडार का मूल्य 55.6 करोड़ डॉलर बढ़कर 37.76 अरब डॉलर हो गया। इसी तरह विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 18.5 करोड़ डॉलर बढ़कर 17.62 अरब डॉलर पर पहुंच गया है।

उल्लेखनीय है कि एक साल पहले अक्टूबर, 2021 में देश का विदेश मुद्रा भंडार 645 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्चतम स्तर पर था। डॉलर में अभिव्यक्त किए जाने वाली विदेशी मुद्रा आस्तियों में मुद्रा भंडार में रखे यूरो, पौंड और जापानी येन जैसे गैर डॉलर मुद्रा के मूल्य में आई कमी या बढ़त के प्रभावों को दर्शाया जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार/प्रजेश शंकर/दधिबल

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एक डॉलर की कीमत 80 रुपए के करीब: कमजोर होते रुपए पर संसद में सवाल, केंद्र ने कहा- 2014 से रुपए की कीमत 25% गिरी

लोकसभा में इससे जुड़े एक प्रश्न विदेशी मुद्रा जापानी येन के लिखित जबाव में केंद्र सरकार ने माना कि बीते 8 साल में (दिसंबर 2014 के बाद) डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमतों में 16.08 रुपए (25.39%) की गिरावट आई है। जनवरी 2022 से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले डोमेस्टिक करेंसी में विदेशी मुद्रा जापानी येन लगभग 7.5% की गिरावट आई है। जनवरी में रुपया 73.50 के करीब था।

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रुपए के टूटने के कारण बताए। उन्होंने कहा, 'रूस-यूक्रेन जंग जैसे ग्लोबल फैक्टर, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और ग्लोबल फाइनेंशियल कंडीशन्स का कड़ा होना, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए के कमजोर होने के प्रमुख कारण हैं।' उन्होंने कहा, 'ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन और यूरो जैसी करेंसी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की तुलना में ज्यादा कमजोर हुई हैं और इसलिए, भारतीय रुपया 2022 में इन करेंसीज के मुकाबले मजबूत हुआ है।'

सीतारमण ने यह भी कहा कि कमजोर करेंसी एक्सपोर्ट को कॉम्पिटिटिव बनाता है लेकिन इससे इंपोर्ट भी महंगा बन जाता है। उन्होंने कहा, भारतीय रिजर्व बैंक नियमित रूप से विदेशी मुद्रा बाजार की निगरानी करता है और एक्सेस वोलेटिलिटी (अतिरिक्त अस्थिरता) में हस्तक्षेप करता है। विदेशी निवेशकों ने वित्त वर्ष 2022-23 में अब तक करीब 14 अरब डॉलर निकाले हैं। सिर्फ जुलाई में ही FPI ने 7400 करोड़ रुपए की निकासी भारतीय बाजारों से की है।

कैसे तय होती है करेंसी की कीमत?
करेंसी के उतार-चढ़ाव के कई कारण होते हैं। डॉलर की तुलना में किसी भी अन्य करेंसी की वैल्यू घटे तो इसे उस करेंसी का गिरना, टूटना, कमजोर होना कहते हैं। अंग्रेजी में - करेंसी डेप्रिशिएशन। हर देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय लेन-देन करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है। अगर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर, अमेरिका के रुपयों के भंडार के बराबर है तो रुपए की कीमत स्थिर रहेगी। हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा।

कहां नुकसान या फायदा?
नुकसान: कच्चे तेल का आयात महंगा होगा, जिससे महंगाई बढ़ेगी। देश में सब्जियां और खाद्य पदार्थ महंगे होंगे। वहीं भारतीयों को डॉलर में पेमेंट करना भारी पड़ेगा। यानी विदेश घूमना महंगा होगा, विदेशों में पढ़ाई महंगी होगी।

फायदा: निर्यात करने वालों को फायदा होगा, क्योंकि पेमेंट डॉलर में मिलेगा, जिसे वह रुपए में बदलकर ज्यादा कमाई कर सकेंगे। इससे विदेश में माल बेचने वाली IT और फार्मा कंपनी को फायदा होगा।

करेंसी डॉलर-बेस्ड ही क्यों और कब से?
फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में अधिकांश मुद्राओं की तुलना डॉलर से होती है। इसके पीछे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुआ ‘ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट’ है। इसमें एक न्यूट्रल ग्लोबल करेंसी बनाने का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि, तब अमेरिका अकेला ऐसा देश था जो आर्थिक तौर पर मजबूत होकर उभरा था। ऐसे में अमेरिकी डॉलर को दुनिया की रिजर्व करेंसी के तौर पर चुन लिया गया।

कैसे संभलती है स्थिति?
मुद्रा की कमजोर होती स्थिति को संभालने में किसी भी देश के केंद्रीय बैंक का अहम रोल होता है। भारत में यह भूमिका रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की है। वह अपने विदेशी मुद्रा भंडार से और विदेश से डॉलर खरीदकर बाजार में उसकी मांग पूरी करने का प्रयास करता है। इससे डॉलर की कीमतें रुपए के मुकाबले स्थिर करने में कुछ हद तक मदद मिलती है।

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