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लिक्विडिटी

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What is the Hindi meaning of liquidity in the stock market?

लिक्विड स्टॉक्स क्या है, लिक्विड स्टॉक्स को कैसे पहचानें, स्टॉक लिक्विडिटी क्या होती है, क्या लिक्विड स्टॉक्स खरीदना सही है (What is liquid stocks in hindi, Liquid stocks kya hai, Stock liquidity in hindi, How to identify liquid stocks)

हमें अक्सर सुनने को मिलता है कि जिस स्टॉक के अंदर लिक्विडिटी नहीं है हमें उसे buy नहीं करना चाहिए लेकिन यह बात हमेशा सही नहीं होती।

हमें यह पता होना चाहिए कि अगर कोई स्टॉक लिक्विड नहीं है तो उसका क्या कारण है। आपको स्टॉक्स की लिक्विडिटी को समझना बहुत जरूरी है तभी आप एक अच्छा लिक्विड स्टॉक्स buy कर सकते हैं।

इसीलिये आज हम आपको बताने वाले हैं-

लिक्विड स्टॉक्स क्या है?
स्टॉक्स की लिक्विडिटी क्यों महत्वपूर्ण है?
अच्छे लिक्विड स्टॉक्स कैसे ढूंढे?
स्टॉक्स की लिक्विडिटी कैसे पता करें?
लिक्विड स्टॉक्स खरीदना चाहिए या नहीं?

तो इन सबके बारे में जानने के लिए इस पोस्ट को पूरा ध्यान से पढ़िएगा चलिए शुरू करते हैं:

Stock Liquidity की परिभाषा

हम किसी भी stock को कितनी आसानी से Buy या Sell कर सकते हैं बिना उसके प्राइस को Imapact किये। मतलब हमारी Buying या Selling से उसके price पर ज्यादा असर नहीं होना चाहिए।

तो कोई भी स्टॉक आपके लिए Liquid है या illiquid यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उसकी कितनी Quantity Buy करना चाहते हो।

Quantity का अर्थ है: Number of Shares मतलब आपने कितने शेयर्स खरीदे हैं।

Example: मान लो आपको किसी स्टॉक के केवल 100 शेयर्स ही खरीदना है तो आपको उसके ट्रेडिंग वॉल्यूम से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा भले ही उसका ट्रेडिंग वॉल्यूम कम क्यों ना हो।

लेकिन अगर आपको उस स्टॉक के 10000 या 50,000 शेयर्स खरीदने हैं तो आपको पहले ट्रेडिंग वॉल्यूम को देखना होगा।

लिक्विड स्टॉक्स क्या है?

लिक्विड स्टॉक्स का अर्थ है कि किसी स्टॉक को कितनी आसानी से खरीदा या बेचा जा सकता है बिना स्टॉक के प्राइस को impact किये। मतलब जिन स्टॉक्स में बहुत सारे buyers और sellers interested होते हैं उन्हें High Liquidity stocks या लिक्विड स्टॉक्स कहते हैं।

इसी तरह जिन stocks में कम लोग interested होते हैं उन्हें Low Liquidity stocks या illiquid stocks कहते हैं।

लिक्विड स्टॉक्स के चार्ट्स हमेशा smoothly चलते हैं। यानी की ग्राफ की movement के बीच में बहुत ज्यादा gap या space नहीं होता है। ये वही stocks होते लिक्विडिटी हैं जिन्हें बहुत ज्यादा ट्रेड किया जाता है।

जबकि जो stocks लिक्विड नहीं होते हैं उनके price movement के chart में बहुत ज्यादा उथल-पुथल दिखाई लिक्विडिटी देती है यानी कि charts कभी अचानक से ऊपर तो कभी अचानक से नीचे दिखाई देता है।

इसीलिए इनके ग्राफ की movement के बीच में space बहुत ज्यादा होता है। ऐसे stocks का प्राइस बहुत कम होता है और इन्हें हम Penny stocks या illiquid stocks भी बोलते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि केवल स्टॉक की लिक्विडिटी को देखकर ही स्टॉक्स को खरीदना चाहिए। अगर स्टॉक लिक्विडिटी कम है तो उसे नहीं खरीदना चाहिए लेकिन यह बात हर बार सच नहीं होती। आइये इसे एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं- मान लीजिए कोई High Value Stock है मतलब उसका price बहुत ज्यादा है। For Example: MRF कम्पनी का Share price 80000 के आसपास है। अब चूंकि MRF का price ज्यादा है इसलिए इसका volume कम होगा। मतलब खरीदने और बेचने वालों की संख्या कम होगी. (MRF की Average Trading Volume 10000 के आस पास ही रहती है उससे ज्यादा नहीं क्योंकि इसका प्राइस बहुत High है) यानी कि इस स्टॉक को बहुत कम लोग खरीदेंगे। चूंकि इसका Trading Volume कम है इसलिए इस स्टॉक्स की लिक्विडिटी भी कम होगी। तो इसका मतलब यह नहीं है कि यह एक अच्छा स्टॉक नहीं है बल्कि MRF तो इंडिया की टॉप कंपनीज में से एक है। तो सिर्फ ट्रेडिंग वॉल्यूम को देखकर ही यह सोचना कि हमें इसमें निवेश नहीं करना चाहिए तो आपका यह निर्णय गलत होगा। इसीलिए स्टॉक्स की लिक्विडिटी को समझना आपके लिए बहुत जरूरी है। इसे भी पढ़े : Free Paynearby Retailer ID Registration

स्टॉक्स की लिक्विडिटी क्या होती है?

स्टॉक्स की लिक्विडिटी को जानने से पहले हमें लिक्विडिटी को समझना होगा-

लिक्विडिटी का हिंदी अर्थ होता है ‘तरलता’ यानी कि पानी की तरह चलने वाला। लेकिन स्टॉक मार्केट में लिक्विडिटी का संबंध ‘सरलता’ से है ना की ‘तरलता’ से।

मतलब अगर किसी मार्केट में market participants यानी कि buyers और sellers को ट्रेड करने में सरलता होती है तो हम कह सकते हैं लिक्विडिटी कि वह मार्केट लिक्विड मार्केट है।

ट्रेड का मतलब होता है (खरीदना और बेचना)

तो लिक्विडिटी हमें यह दिखाती है कितनी आसानी से किसी भी Asset को cash में convert किया जा सकता है।
जैसे– House, Building, Furniture, Machines etc.

आपको बता दें हर Asset की लिक्विडिटी अलग-अलग होती है जैसे; Cash की लिक्विडिटी सबसे ज्यादा होती है, उसके बाद Gold और फिर उसके बाद Stocks की लिक्विडिटी उससे भी कम होती है।

लेकिन सबसे कम लिक्विडिटी Modern Arts या equipment जैसी चीज़ों की होती है मतलब ऐसी चीजें जिन्हें sell करना काफी मुश्किल होता है।

उदाहरण: मान लीजिए कि आपके पास कोई जमीन है जो एक तरह से आपका Asset है। अगर आप किसी कारण से इसे बेचना चाहते हैं तो आप उसे तुरंत नहीं बेच पाएंगे क्योंकि पहले आपको कोई खरीददार ढूंढना होगा जिसे आप की जमीन पसंद आ सके और वह आपकी इच्छा के अनुसार पैसे दे सके।

लेकिन ऐसा खरीददार ढूंढने में आपको काफी समय लग सकता है और उसके बाद उस जमीन को बेचने की पूरी प्रोसेस में काफी समय भी लग जाएगा इसीलिए हम कह सकते हैं कि उस जमीन की लिक्विडिटी कम है।

क्योंकि उसे आसानी से cash में convert नहीं किया जा सकता है।

दूसरी ओर अगर हमारे पास कोई ऐसी मशीन है जो कि हमारे क्षेत्र में बहुत कम लोगों के पास है और उसे बहुत सारे लोग खरीदना चाहते हैं तो अगर आप उस मशीन को बेचना चाहें तो आप उसे तुरंत किसी को भी बेच सकते हैं और उसके बदले में आपको पैसे मिल जाएंगे इसका मतलब है कि उस मशीन की लिक्विडिटी बहुत ज्यादा है।

बिल्कुल यही कांसेप्ट स्टॉक्स की लिक्विडिटी पर भी लागू होता है जैसे;

अगर किसी स्टॉक्स की लिक्विडिटी ज्यादा है तो इसका मतलब है कि उस stock को बहुत ज्यादा ट्रेड किया जा रहा है यानी कि बहुत सारे लोग उस स्टॉक को खरीद या बेच रहे हैं.

ठीक इसके विपरीत अगर किसी स्टॉक्स की लिक्विडिटी कम है तो उस स्टॉक्स को बहुत कम लोग खरीद और बेच रहे हैं.

इसका मतलब है कि जिस स्टॉक की लिक्विडिटी जितनी ज्यादा होती है वह stock उतना ज्यादा पॉपुलर होता है और जिस स्टॉक की लिक्विडिटी कम होती है वह उतना ही कम पॉपुलर होता है।

जैसे- Penny Stocks

पेनी स्टॉक्स का मतलब वह स्टॉक्स जो ज्यादातर लोगों के बीच पॉपुलर नहीं है और इनको बहुत कम लोग जानते हैं इसीलिए इन्हें बहुत कम खरीदा या बेचा जाता है.

अगर पेनी स्टॉक्स को कोई अचानक से बहुत ज्यादा खरीद लेता है तो इसका प्राइस अचानक से ऊपर चला जाता है और अगर कोई बेच देता है तो ग्राफ अचानक से नीचे आ जाता है। यही कारण है लिक्विडिटी कि इसके प्राइस का ग्राफ स्मूथ तरीके से आगे नहीं बढ़ता है और इसीलिए पेनी स्टॉक्स को हम iliquid stocks भी कह सकते हैं।

क्या कम लिक्विडिटी वाले स्टॉक्स में निवेश करना चाहिए?

आपको अक्सर बोला जाता है कि कम लिक्विडिटी वाले स्टॉक्स में निवेश नहीं करना चाहिए लेकिन ऐसा आपको क्यों बोला जाता है?

उसके पीछे पहला कारण यह है कि आपको जानबूझकर ऐसे stocks से दूर रखा जाता है।

आपने देखा होगा कि जो स्टॉक्स मल्टीबैगर (multibagger) बनते हैं शुरुआत में उनका वॉल्यूम भी कम होता है क्योंकि शुरुआत में बड़े इन्वेस्टर्स और कंपनियां ही उसमें Invest करते हैं और उसके बहुत सारे शेयर्स को अकेले ही खरीद लेते हैं।

लेकिन जब Volume और Price बढ़ना शुरू होता है तो धीरे-धीरे आप और हम जैसे Retail Investors का ध्यान भी इन stocks की तरफ जाता है।

दूसरा कारण यह है कि आपको केवल Liquid stocks को खरीदने के लिए ही हर जगह बोला जाता है क्योंकि ये Hot Stocks होते हैं इसलिए आपके नुकसान होने की संभावना भी ज्यादा होती है।

मेरी सलाह है कि आप Hot stocks से जितना हो सके उतना दूर रहिए। लालच में आकर उसे मत खरीदिये क्योंकि इनका प्राइस और वॉल्यूम किसी न्यूज़ के चलते अचानक से बढ़ जाता है और इनमें लिक्विडिटी आ जाती है लेकिन कुछ समय बाद इनका प्राइस अचानक से dump हो जाता है जिससे बहुत सारे निवेशकों को नुकसान झेलना पड़ता है।

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सिस्टम में नकदी बढ़ाने के लिए आरबीआई गवर्नर शक्तिकांता दास मैराथन बैठकें कर रहे हैं। आज आरबीआई गवर्नर ने एमएसएमई के साथ बैठक की। बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर शक्तिकांता दास ने कहा…

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बैंकिंग प्रणाली की लिक्विडिटी तीन वर्षों में पहली बार घाटे में

बैंकिंग प्रणाली की लिक्विडिटी तीन वर्षों में पहली बार घाटे में चली गई। इंडिया रेटिंग्स द्वारा संकलित भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के अनुसार, 20 सितंबर, 2022 को नेट लिक्विडिटी इंजेक्शन 21,873.43 करोड़ रुपये था। इस तरह मई 2019 के बाद बैंकों के पास लिक्विडिटी (कैश) सरप्लस की स्थिति डेफिसिट में बदल गयी है।

आज से ठीक एक साल पहले (सितंबर 2021 में) बैंकिंग प्रणाली में शुद्ध अधिशेष तरलता (Net surplus liquidity) लिक्विडिटी 8.03 लाख करोड़ रुपये थी।

लिक्विडिटी घाटे की कई वजहें हो सकती हैं

भारत की बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी घाटे की कई वजहें हो सकती हैं:

कोविड महामारी के बाद बैंकों से ऋण की मांग में वृद्धि हुई है और बैंकों ने अधिक ऋण वितरित किये होंगे।

ऋण की मांग के अनुपात में बैंकों में जमा नहीं आ रहे होंगे। अर्थात बैंक कर्ज अधिक दे रहे हैं लेकिन बैंकों में पैसा उसी अनुपात में कम जमा हो रहा है।

कॉरपोरेट्स ने अग्रिम कर भुगतान (एडवांस टैक्स पेमेंट) भी अधिक किया है। यह भी एक वजह है।

इसके अलावा, अमेरिकी लिक्विडिटी डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक भी कदम उठा रहा है। बैंकों में लिक्विडिटी कम होने की यह भी एक वजह हो सकती है।

क्या होती है बैंकिंग लिक्विडिटी (बैंकिंग तरलता)?

बैंकिंग प्रणाली में तरलता से मतलब आसानी से उपलब्ध नकदी या कैश से है जिसे बैंकों को अल्पकालिक बिजनेस और वित्तीय जरूरतों को पूरा करने की आवश्यकता होती है।

किसी दिए गए दिन, यदि बैंकिंग प्रणाली तरलता समायोजन सुविधा ( Liquidity Adjustment Facility: LAF) के तहत RBI का एक शुद्ध उधारकर्ता (net borrower) है, तो कहा जाता है कि बैंकिंग सिस्टम तरलता घाटे (liquidity deficit) में है।

इसके विपरीत यदि बैंकिंग प्रणाली RBI के लिए एक शुद्ध ऋणदाता (net lender) है, तो सिस्टम तरलता सरप्लस कहा जा सकता है। LAF आरबीआई के उस ऑपरेशन्स को कहा जाता है जिसके माध्यम से यह बैंकिंग प्रणाली में नकदी डालता है या उससे नकदी निकालता है।

लिक्विडिटी घाटे के प्रभाव

बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी की कमी के कई प्रभाव हो सकते हैं। इस स्थिति में सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड में वृद्धि हो सकती है और बाद में उपभोक्ताओं के लिए ब्याज दरों में भी वृद्धि हो सकती है।

RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने बैंकों को दी नसीहत, लोन के जरिए मार्केट में बढ़ाए लिक्विडिटी

इकनॉमिकल रिवाइवल पहले की तरह कायम रहे इसके लिए आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने बैंकों को उठाए जाने वाले ठोस कदम के बारे में बताया.

RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने बैंकों को दी नसीहत, लोन के जरिए मार्केट में बढ़ाए लिक्विडिटी

Apr 13, 2021 | 10:57 AM

भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रहे सुधार को कोरोना की दूसरी लहर से खतरा हो सकता है. ऐसे में इकनॉमिकल रिवाइल को जारी रखने के मकसद से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर शक्तिकांत दास (Shaktikanta Das) ने बैंकों को बदलती परिस्थितियों पर नजर रखने की सलाह दी है. साथ ही लोन के जरिए लिक्विडिटी बढ़ाने को कहा है. ये बात उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई बैठक में कही.

आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि मौजूदा इकनॉमिक रिवाइवल जो अभी शुरुआती चरण में है, उसे कायम रखने के लिए ऋण प्रवाह यानी क्रेडिट फ्लो बेहद जरूरी है. कारोबार की निरंतरता बनाए रखने और इसे ज्यादा तेज करने के लिए ठोस रणनीति बनाई जानी चाहिए. इसके लिए आगे बढ़कर कदम उठाना चाहिए. साथ ही पर्याप्त पूंजी जुटाने पर भी ध्यान देना चाहिए.

इस दौरान उन्होंने केंद्रीय बैंक द्वारा वित्तीय स्थिरता को कायम रखते हुए मौजूदा सुधार की गति को जारी रखने के लिए उठाए गए कदम का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इस परिस्थिति से निपटने के लिए भी कुछ इसी तरह की पहल की जरूर होगी. गवर्नर ने बैंकों की भुगतान और आईटी प्रणाली पर खास फोकस रखने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि प्रणाली की दक्षता और क्षमता को बढ़ाया जाना चाहिए जिससे ग्राहकों को बिना किसी रुकावट के सेवाओं का लाभ मिल सके.

बैठक में आरबीआई गवर्नर ने कोविड समाधान के लिए तय की गई रणनीति के क्रियान्वयन और उसमें हुई प्रगति, दबाव वाली संपत्तियों के परिदृश्य और पूंजी के विस्तार जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की.

RBI Monetary Policy: आरबीआई ने सिडबी को दी 16 हजार करोड़ रुपये की विशेष लिक्विडिटी की सुविधा

RBI Monetary Policy: आरबीआई ने सिडबी को 16 हजार करोड़ रुपये की विशेष लिक्विडिटी की सुविधा दी है.

Published: June 4, 2021 3:34 PM IST

Reserve Bank of India

RBI Monetary Policy: आरबीआई (RBI) एमएसएमई (MSME) को और समर्थन देने के लिए सिडबी (Sidbi) को 16,000 करोड़ रुपये की विशेष लिक्विडिटी (Special Liquidity) की सुविधा दे रहा है. यह अप्रैल में घोषित 15,000 करोड़ रुपये की लिक्विडिटी सुविधा से अधिक है. मौजूदा कोविड संकट और राज्यों में लॉकडाउन के बीच इस सुविधा से एमएसएमई का समर्थन लिक्विडिटी अपेक्षित है.

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विकासात्मक और नियामक नीतियों पर बयान में कहा गया है कि लघु और मध्यम अवधि में एमएसएमई की ऋण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए छोटे एमएसएमई और व्यवसायों पर अतिरिक्त ध्यान देने के साथ निवेश चक्र शुरू करने के लिए सिडबी को 16,000 करोड़ रुपये की विशेष लिक्विडिटी सुविधा प्रदान करने का निर्णय लिया गया है. इसमें ऋण की कमी सहित अधिक महत्वाकांक्षी जिलों को शामिल किया गया है.

इसमें आगे कहा गया, डबल इंटरमीडिएशन, पूल्ड बॉन्ड, लोन जारी करने सहित अन्य मॉडलों और संरचनाओं के माध्यम से ऑन-लेंडिंग रीफाइनेंसिंग के लिए सुविधा का विस्तार किया जाएगा.

यह सुविधा प्रचलित पॉलिसी रेपो दर पर एक वर्ष तक की अवधि के लिए उपलब्ध होगी. आरबीआई ने कहा कि वह इसके उपयोग के आधार पर सुविधा के और विस्तार पर विचार कर सकता है.

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